Wednesday, July 16, 2008

स्वस्थ मन का रहस्य

जो अपनी जिंदगी मे कुछ करने मे असफल रहते है, वे प्रायः आलोचक बन जाते है | दूसरो की कमिया देखना, निंदा करना उनका स्वभाव बन जाता है | यहाँ तक की ऐसे लोग अपनी कमियों-कमजोरियों का दोष भी दूसरो के सर मढ़ देते है | सच, यही है की जीवन-पथ पर चलने में जो असमर्थ है, वे राह के किनारे खड़े होकर औरो पर पत्थर फेंकने लगते है | ध्यान रहे स्वस्थ मन वाला व्यक्ति कभी किसी की निंदा मे सलंगन नही होता है |

लोकमान्य तिलक से किसी ने आश्चर्यचकित होते हुऐ पूंछा - " कई बार आपकी बहुत निन्दापूर्ण आलोचनाये होती है, लेकिन आप तो कभी विचलित नही होते | " उत्तर मे लोकमान्य तिलक मुस्कराए और बोले- " निंदा ही क्यों कई बार लोग प्रशंषा भी करते है |" ऐसा कह कर उन्होंने पूंछने वाले की आँखों मे गहराई से झाँका और बोले-"यह तो मेरी जिन्दगी का रहस्य है, पर मे आपको बता देता हूँ | निंदा करने वाले मुझे शैतान समझते है और प्रशंसक मुझे भगवान का दर्जा देते है, लेकिन सच मे जानता हूँ और वह सच यह है कि मै तो शेतान हूँ और भगवान | मै तो एक इन्सान हूँ, जिसमे थोड़ी कमिया है और थोड़ी अच्छाइया और मै अपनी कमियों को दूर करने एवम् अच्छाइयों को बढ़ाने मे लगा रहता हूँ |"

" एक बात और भी है " _ लोकमान्य ने अपनी बात आगे बढाई | जब अपनी जिन्दगी को मै ही अभी ठीक से नही समझ पाया तो भला दूसरे क्या समझेंगे | इसलिये जितनी झूंठ उनकी निंदा है, उतनी ही उनकी प्रशंसा है | इसलिए मै उन दोनों बातो की परवाह करके अपने आप को और अधिक सँवारने-सुधारने की कोशिश करता रहता हूँ |" सुनने वाले व्यक्ति को इन बातो को सुनकर लोकमान्य तिलक के स्वस्थ मन का रहस्य समझ मे आया | उसे अनुभव हुआ की स्वस्थ मन वाला व्यक्ति तो किसी की निंदा करता है और ही किसी निंदा अथवा प्रशंशा से प्रभावित होता है |

No comments: