भिक्षु आनंदभद्र के जीवन का एक मार्मिक प्रसंग हैं। वह पूरबी देशों में धर्मप्रचार के लिए गए हुए थे। कुछ अज्ञानियों ने उन्हें पकड़ लिया और भारी यातना दी। परन्तु इन यातनायों के बीच भी उनकी शान्ति अविचल थी। यातनाओं के बीच भी वह परम प्रसन्न थे। गालियों के उत्तर में उनकी वाणी मिठास से सनी थी। किसी ने उनसे पूछा, आप में इतनी अलौकिक शक्ति कैसे आई ? उन्होंने एक हलकी मुस्कराहट के साथ कहा, बस, मैंने अपनी आंखों का उपयोग करना सीख लिया।
प्रश्नकर्ता ने अचरज से प्रतिप्रश्न किया, लेकिन आंखों का शान्ति और साधुता से क्या सम्बन्ध ? संभवतः वह भिक्षु आनंदभद्र की सहनशीलता के मर्म से अपरिचित था। उसे समझाने के लिए महाभिक्षु ने कहा, मैं जब ऊपर आकाश की ओर देखता हूँ तो पाता हूँ की इस धरती का जीवन बहुत ही क्षणभंगुर ओर सपने की तरह हैं ओर सपने में किया हुआ किसी का व्यवहार मुझे कैसे छू सकता हैं ? जब दृष्टि अपने भीतर निहारती हैं तो उसे पाता हूँ जो अविनश्वर हैं-उसका तो कोई कुछ भी बिगाड़ने में समर्थ नहीं है।
जब मैं अपने आस-पास देखता हूँ तो पाता हूँ-ऐसे भी भावनाशील जन हैं, जिनके हृदयो में मेरे लिए असीम करुना है। यह अनुभूति कृतज्ञता से भर देती है। अपने पीछे देखने पर अहसास होता है कि कितने ही प्राणी ऐसे हैं, जो मुझसे भी कहीं ज्यादा पीड़ा भोग रहे हैं। उन्हें देखकर मेरा हृदय करुणा ओर प्रेम से भर जाता है। इस भांति मैं शांत हूँ, आनंदित हूँ ओर प्रेम से भर गया हूँ, क्योंकि मैंने अपनी आंखों का उपयोग करना सीख लिया है। सचमुच ही आँखें खोलने से-जीवन-दर्शन मिलता है।
अखंड ज्योति अप्रैल २००४

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