चीनी संत लाओत्से के जीवन का एक प्रसंग है। साँझ के समय उसके पास एक युवक ची-लू एक उलझन लेकर आया। लाओत्से ने साँझ के झुटपुटे में उसके चेहरे की और ताकते हुऐ कहा-" अपनी बात कहो ! " इस पर उस युवक ने पूंछा- " मृत्यु क्या हैं ? " लाओत्से ने अपने उत्तर मैं थोडी हैरानी व्यक्त करते हुऐ कहा-" अरे ! समस्या तो जीवन की होती है, मृत्यु की कैसी समस्या ! " फ़िर थोडी देर रूककर लाओत्से ने धीमे से कहा-"मृत्यु उनके लिए समस्या बनी रहती है, जो जीवन की समस्या का समाधान नहीं जान लेते। "
ची-लू लाओत्से के कथन को ध्यान से सुन रहा था। वृद्ध लाओत्से उससे कह रहा था-" अपनी शक्तियों को केवल जीवन जी लेने में नहीं, बल्कि उसे ज्ञात करने मैं लगाओ। मृत्यु एवम् मृतात्माओं की चिंता करने के बजाय जीवन एवम् जीवित मनुष्यों की समस्याओं के समाधान की खोज करो। अरे ! जब तुम अभी जीवन से ही परिचित नहीं हो, तब तुम मृत्यु से भला कैसे परिचित हो सकते हो ! "
लाओत्से के कथन की गहराई का अहसास ची-लू को होने लगा। उसने अनुभव किया की जो जीवन को जान लेते हैं, केवल वे ही मृत्यु को जान पाते हैं। जीवन का रहस्य जिन्हें ज्ञात हो जाता है, उन्हें मृत्यु भी रहस्य नहीं रह जाती ; क्योंकि वह तो उसी सच का दूसरा पहलु है। मृत्यु का भय केवल उन्हें सताता है, जो जीवन को नहीं जानते। मृत्यु के भय से जो मुक्त हो सका, समझना की उसने जीवन का बोध पा लिया।
अखंड ज्योति- जून २००८

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