Wednesday, September 10, 2008

श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ऐसा सुमधुर गीत हैं, जिसे स्वयं भगवान ने गाया हैं। धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में खड़े विश्वरुप विश्वगुरु श्रीकृष्ण ने कर्म का यह काव्य कहा हैं। इसमें सृष्टि का सरगम हैं, जीवन के बोल हैं। सृष्टिसृजन, स्थिति और विलय का कोई भी ऐसा रहस्य नहीं हैं, जिसे इस भगवद्गान में गाया न गया हो। इसी तरह जीवन के सभी आयाम, सभी विद्याएँ इसमें बड़े ही अपूर्व ढंग से प्रकट हुई हैं। इस दिव्य गीत के सृष्टि सप्तक (सप्तलोक) को प्रकृति अष्टक (अष्टधा प्रकृति) के साथ स्वयं भगवती चित्शक्ति ने अपनी चैतन्य धाराओं में गूँथा हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता का परिचय स्वयं भगवद्गीता के प्रत्येक अध्याय के अंत में कहा गया हैं। “ ओम तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रम्हविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे............. नाम..............अध्याय: । " ओंकार परमेश्वर का तत्-सत् रुप में स्मरण करते हुए बताया गया हैं कि यह भगवद्गान उपनिषद् हैं, यह ब्रम्हविद्या हैं, यह योगशास्त्र हैं, जो कृष्ण और अर्जुन संवाद बनकर प्रकट हुआ हैं। भगवद्गीता के इस परिचय में गहनता और व्यापकता दोनों हैं। यह भगवद्गीता उपनिषदों की परम्परा में श्रेष्ठतम उपनिषद् हैं।

इस उपनिषद् के आचार्य श्रीकृष्ण हैं और शिष्य धनुषपाणि अर्जुन हैं। आचार्य श्रीकृष्ण समस्त ज्ञान का आदि और अन्त हैं। वे स्वयं अनन्त हैं। शिष्य अर्जुन जिज्ञासु हैं, गुरुनिष्ठ हैं और अपने सदगुरु भगवान गुरु को पूर्णत: समर्पित है। सदगुरु व सत्शिष्य की इसी स्थिति में ब्रम्हविद्या प्रकट होती हैं। सृष्टि व जीवन के सभी रहस्य कहे-सुने-समझे व आत्मसात किये जाते हैं, परन्तु इन रहस्यों का साक्षात् व साकार तभी स्पष्ट होता हैं, जब शिष्य योगसाधक बन कर सदगुरु द्वारा उपदिष्ट योग-साधना का अभ्यास करे। योग की विविध तकनीको का इसमें प्राकट्य होने से ही गीता योगशास्त्र हैं। उपनिषद्प्रणीत यह ब्रम्हविद्या-योगशास्त्र तभी समझा जा सकता हैं, जब कृष्ण-अर्जुन संवाद की स्थिति बनें। श्रीमद्भगवद्गीता तो केवल उनके अन्तस् में अपने स्वरों को झंकृत करती हैं, जो भगवान के साथ समस्वरित हैं। ‘गीता जयंती पर्व हमें इसी की स्मृति कराता हैं।

Sunday, September 7, 2008

प्रज्ञावतार की पुण्यवेला

अन्धकार जब गहराता चला जाए, तो इसकी सघनतम स्थिति के अतिसमीप ही प्रभातकाल की ब्रम्हवेला भी जुड़ी रहती हैं। गर्मी की अतिशय तपन बढ़ चलने पर वर्षा की सम्भावना का अनुमान लगाया जा सकता हैं और सार्थक भी होता हैं। चारों ओर झुलस गयी धरती हरियाली के कवच से भर जाती हैं, मानो एक अप्रत्याशित चमत्कार-सा हुआ हो। दीपक जब बुझने को होता हैं, तो उसकी लौ जोर-जोर से चमकती हैं, लपलपाने लगती हैं। मरण की वेला अतिनिकट होने पर भी रोगी में हलकी-सी चेतना अवश्य लौट आती हैं और वह असामान्य रुप से लम्बी-लम्बी सॉंसे लेने लगता हैं। सभी जानते हैं कि मृत्यु की वेला समीप आ गयी। मरण के पूर्व कुछ ही पहले चींटी के पर निकलने लगते हैं।

उपर्युक्त उदाहरण आज की युगसंधि की वेला एवं प्रज्ञावतार के आगमन के पुण्य-प्रयोजन की व्याख्या हेतु दिए गए हैं। इन दिनो असुरता जीवन-मरण का संघर्ष कर रही हैं। उसे समाप्त होना ही हैं, मात्र उसका अंतिम चरण '' हताशा की स्थिति में एक उग्र रुप और '' - इस परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाना चाहिए। अनीति की थोड़ी मात्रा नीतिवानो के सामने चुनौति बनकर पहुंचती और उन्हे अनौचित्य से लड़ पड़ने की उत्तेजना एवं पौरुष प्रदान करती है। जन-जन को दुष्टता का पराभव देखने का अवसर मिलता है। जागरुकता, आदर्शवादिता और साहसिकता का उभार होता ही तब हैं जब अनय के असुर की दुरभिसंधिया देवत्व में आक्रोश का आवेश भरती हैं। इस दृष्टि से अनय का अस्तित्व दुखदायी होते हुए भी अन्तत: उत्कृष्टता के प्रखर बने रहने की सम्भावनाएं प्रशस्त बनाए रखता है।

किन्तु यदा-कदा परिस्थितियॉं ऐसी भी आती हैं, जब संत, सुधारक और शहीद अपने प्रराक्रम प्रभाव का परिमाण भारी देखते हैं एवं विपन्नता से लड़ते-लड़ते भी सत्परिणाम की संभावना को धुमिल देखते हैं। ऐसे अवसरों पर अवतार का पराक्रम उभरता हैं और ऐसी परिस्थितियॉं विनिर्मित करता हैं, जिससे पासा पलटने, परिस्थिति उलटने का असंभाव्य भी संभव हो सके। विपित्त की विषम वेला में सदा यही होता रहा हैं। भविष्य में भी यही क्रम चलेगा। वर्तमान में इसके महातथ्य का प्रत्यक्ष स्पष्टीकरण सामने हैं। युगपरिवर्तन की इस पुण्यवेला में प्रज्ञावतार की प्रखर भूमिका संपादित होते हुए ज्ञानवानों की पैनी दृष्टि सरलतापूर्वक देख सकती है।

अखण्ड ज्योति अगस्त-1969


Saturday, September 6, 2008

मनन

मनन मन से मन-न होने की आध्यात्मिक यात्रा हैं। यह ऐसी अनोखी प्रक्रिया हैं, जिसमें संलग्न होने, समर्पित होने पर मन का संपूर्णत: विसर्जन और विलय हो जाता हैं। इस सच पर कितना ही कोई अचरज क्यों न करे, फिर भी सच तो सच ही हैं। हालॉंकि इस अनूठे रहस्य से कम ही लोग परिचित हैं जबकि मनन शब्द का प्रयोग बहुतायत में होता हैं। अनेकों, अनेक बार इसका प्रयोग करते हैं, फिर भी इसके आध्यात्मिक रहस्य का स्पर्श विरले ही कर पाते हैं।

सामान्य सोच तो एक विचार को बार-बार सोचते रहने को मनन मान लेती हैं जबकि अध्यात्मवेत्ता कहते हैं कि मन में उठती किसी विशेष विचार की गुनगुनाहट-गूँज अथवा ध्वनि-प्रतिध्वनि को मनन कहना ठीक नहीं हैं। यह तो एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति हैं, जो किसी सत्यान्वेषी साधक को तब होती हैं, जब वह किसी पवित्र विचार, पवित्र भाव अथवा पावन व्यक्तित्व या उसकी दिव्य छवि को अपने में धारण करता हैं।

यदि पवित्र तत्त्वों-सत्यों को ठीक से धारण कर लिया गया हैं तो मन में स्वत: ही धारणा घटित होने लगती हैं। मन कुछ उसी तरह मौन हो उसकी अनुभूति में डूबता हैं, जैसे कि कोई स्वादलोलुप व्यक्ति स्वादिष्ट भोजन करते समय मूक और मौन हो स्वाद के अनुभव में खो जाता हैं। जैसे-जैसे धारण किए गए पवित्र विचार, पवित्र भाव अथवा पावन व्यक्तित्व या उसकी दिव्य छवि की अनुभूति प्रगाढ़ होती हैं कि मन, उसमें संजोई सारी संस्कारराशि, कर्मबीजों का ढ़ेर, आदतें, प्रवृतियॉं सभी खो जाते हैं। यहॉं तक कि मन मन-न में परिवर्तित हो जाता हैं। मन का यह परिवर्तन और रुपांतरण ही तो मनन हैं, जिसके परिणाम में अंतस् मे उज्ज्वल आत्मप्रकाश की धाराएं फूट पड़ती हैं। यह ऐसा सच हैं, जिसे जो करे, सो जाने।

अखण्ड ज्योति नवंबर 2007


Thursday, September 4, 2008

जिसने आज दिया वही कल देगा।

जिसने आज दिया वही कल देगा। जिसने आज दिया हैं , वह कल भी देगा। वह कल भी देगा- वह कौन है ? परमात्मा ? नहीं, तुम्हारा पुण्य है। इस संसार में जो भी सुख-सुविधा मिलती है वह सब पुण्य से ही मिलती है। पुण्य ही दिलाता हैं और पुण्य ही जिलाता हैं संसार में अगर कोई मॉं-बाप हैं तो पुण्य ही हैं। वही हमारा पालनहार है। इसलिए अपने जीवन में पुण्य का संचय करते रहो। जहॉ से भी मिले पुण्य लूटते रहो। पुण्य का खजाना खाली होने पाये। इस बात का विशेष ख्याल रखना। पूरे दिन में कम से कम दो पुण्य काम जरुर करो। पाप तो दिनभर में सेकडो हो जाते हैं, पर पूरे दिन में कम से कम दो पुण्य जरुर करो। इससे हमारा ना सिर्फ यह जीवन सम्भलेगा अपितु इसके बाद का जीवन भी सम्भल जायेगा। यह जीवन का महत्त्वपूर्ण सूत्र हैं जिसे जीकर हम जीवन को सार्थकता दे सकते है।

Tuesday, September 2, 2008

आध्यात्मिक कैसे बना जा सकता है ?

पूजा अर्चा प्रतीक मात्र हैं, जो बताती है कि वास्तविक उपासक का स्वरुप क्या होना चाहिए और उसके साथ क्या उद्देश्य और क्या उपक्रम जुडा रहना चाहिए।

देवता के सम्मुख दीपक जलाने का तात्पर्य यहॉं हमें दीपक की तरह जलने और सर्वसाधारण के लिए प्रकाश प्रदान करने की अवधारणा हृदयंगम कराता है।

` पुष्प ´ चढाने का तात्पर्य यह है कि जीवनक्रम को सर्वांग सुन्दर, कोमल, सुशोभित रहने में कोई कमी रहने दी जाये।

` अक्षत ´ चढाने का तात्पर्य हैं कि हमारे कार्य का एक नियमित अंशदान परमार्थ प्रयोजन के लिए लगता रहेगा।

` चंदन लेपन ´ का तात्पर्य हैं कि सम्पर्क क्षेत्र में अपनी विशिष्टता सुगंध बनकर अधिक विकसित हो।

` नैवेद्य ´ चढाने का तात्पर्य है-अपने स्वभाव और व्यवहार में मधुरता का अधिकाधिक समावेश करना।

`जप´ का उद्देश्य हैं अपने मन:क्षेत्र में निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचने की निष्ठा का समावेष करने के लिए लिए उसकी रट लगाये रहना।

` ध्यान´ का अर्थ है अपनी मानसिकता को लक्ष्य विशेष पर अविचल भाव से केन्द्रीभूत किये रहना।

` प्राणायाम ´ का प्रयोजन अपने आपको हर दृष्टि से प्राणवान, प्रखर, प्रतिभासम्पन्न बनाये रखना।

अक्षत, चन्दन, पुष्प, धूप-दीप तो पूजा के प्रतीक मात्र हैं, असली पूजा तो लोकमंगल के लिए किए गये उदार सत्प्रयत्नों से ही ऑकी जाती है। समूचे साधना विज्ञान का तत्वदर्शन इस बात पर केन्द्रीभूत है कि जीवनचर्या का बहिरंग और अंतरंग पक्ष निरन्तर मानवी गरिमा के उपयुक्त ढॉंचे में ढलता रहे। कषाय-कल्मषों के दोष-दुर्गुण जहॉं भी छिपे हुए हो उनका निराकरण होता चले।

Monday, September 1, 2008

क्या करें क्या न करें ?

त्यागने योग्य
  • चोरी, बेईमानी, छल, मुनाफाखोरी, हराम की कमाई, मुफ्तखोरी आदि। अनीति से दूर रहना, अनीति से उपार्जित धन का उपयोग न करना।
  • मांसाहार तथा मारे हुए पशुओं के चमडे का प्रयोग बन्द करना।
  • पशुबलि अथवा दूसरों को कष्ट पहुंचाकर अपना भला करने की प्रवृति छोडना।
  • विवाहों में वर पक्ष द्वारा दहेज लेने तथा कन्या पक्ष द्वारा जेवर चढाने का आग्रह न करना।
  • विवाहों की धूम-धाम में धन की और समय की बर्बादी न करना।
  • नशे (तम्बाकू, शराब, भॉग, गॉजा, अफीम आदि) का त्याग।
  • गाली-गलौज एवं कटु भाषण का त्याग।
  • जेवर और फैशनपरस्ती का त्याग।
  • अन्न की बर्बादी, जूठन छोडने की आदत का त्याग।
  • जाति-पॉति के आधार पर ऊंच-नीच, छूत-छात न मानना।
  • पर्दाप्रथा का त्याग-किसी को पर्दा करने के लिए बाध्य न करना। स्वयं पर्दा न करना।
  • महिलाओं एवं लड़कियों के साथ पुरुषों और लड़को की तुलना में भेद-भाव या पक्षपात न करना।
अपनाने योग्य सत्प्रवृतियॉ
  • कम से कम दस मिनट नित्य नियमित गायत्री उपासना।
  • घर में अपने से बडो का नियमित अभिवादन करना।
  • छोटों के सम्मान का ध्यान रखना, उनसे तू करके न बोलना।
  • अपने कर्तव्यों के प्रति जागरुक रहना तथा उनका पालन करना।
  • परिश्रम का अभ्यास बनाये रहना, किसी काम को छोटा न समझना।
  • नियमित स्वाध्याय-जीवन को सही दिशा देने वाला सत्साहित्य कम से कम आधा घण्टे नित्य स्वयं पढना या सुनना।
  • भारतीय संस्कृति की प्रतीक शिखा एवं यज्ञोपवीत का महत्त्व समझना, उन्हें निष्ठापूर्वक धारण करना-दूसरों को प्रेरणा देना।
  • सादगी का जीवन जीना, औसत भारतीय स्तर के रहन-सहन के अनुरुप विचार एवं अभ्यास बनाना। उसमें गौरव अनुभव करना।
  • ज्ञान-यज्ञ-सद्विचार प्रसार के लिये कम से कम 50 पैसा धन और एक घण्टा समय प्रतिदिन बचाकर सही ढंग से खर्च करना।
  • परिवार में सामुहिक उपासना, आरती, आदि का क्रम चलाना।
  • प्रतिवर्ष अपना जन्मदिन सामूहिकरुप से यज्ञीय वातावरण में मनाना तथा जीवन की सार्थकता के लिए व्रतशील जीवनक्रम बनाना।
  • समाज के प्रति, अपने उत्तरदायित्वों के प्रति जागरुकता, समाज में सत्प्रवृतियॉं बढाने के लिए किये जाने वाले सामूहिक प्रयासों में उत्साह भरा योगदान देना।