उपर्युक्त उदाहरण आज की युगसंधि की वेला एवं प्रज्ञावतार के आगमन के पुण्य-प्रयोजन की व्याख्या हेतु दिए गए हैं। इन दिनो असुरता जीवन-मरण का संघर्ष कर रही हैं। उसे समाप्त होना ही हैं, मात्र उसका अंतिम चरण '' हताशा की स्थिति में एक उग्र रुप और '' - इस परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाना चाहिए। अनीति की थोड़ी मात्रा नीतिवानो के सामने चुनौति बनकर पहुंचती और उन्हे अनौचित्य से लड़ पड़ने की उत्तेजना एवं पौरुष प्रदान करती है। जन-जन को दुष्टता का पराभव देखने का अवसर मिलता है। जागरुकता, आदर्शवादिता और साहसिकता का उभार होता ही तब हैं जब अनय के असुर की दुरभिसंधिया देवत्व में आक्रोश का आवेश भरती हैं। इस दृष्टि से अनय का अस्तित्व दुखदायी होते हुए भी अन्तत: उत्कृष्टता के प्रखर बने रहने की सम्भावनाएं प्रशस्त बनाए रखता है।
किन्तु यदा-कदा परिस्थितियॉं ऐसी भी आती हैं, जब संत, सुधारक और शहीद अपने प्रराक्रम प्रभाव का परिमाण भारी देखते हैं एवं विपन्नता से लड़ते-लड़ते भी सत्परिणाम की संभावना को धुमिल देखते हैं। ऐसे अवसरों पर अवतार का पराक्रम उभरता हैं और ऐसी परिस्थितियॉं विनिर्मित करता हैं, जिससे पासा पलटने, परिस्थिति उलटने का असंभाव्य भी संभव हो सके। विपित्त की विषम वेला में सदा यही होता रहा हैं। भविष्य में भी यही क्रम चलेगा। वर्तमान में इसके महातथ्य का प्रत्यक्ष स्पष्टीकरण सामने हैं। युगपरिवर्तन की इस पुण्यवेला में प्रज्ञावतार की प्रखर भूमिका संपादित होते हुए ज्ञानवानों की पैनी दृष्टि सरलतापूर्वक देख सकती है।
अखण्ड ज्योति अगस्त-1969

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