सामान्य सोच तो एक विचार को बार-बार सोचते रहने को मनन मान लेती हैं जबकि अध्यात्मवेत्ता कहते हैं कि मन में उठती किसी विशेष विचार की गुनगुनाहट-गूँज अथवा ध्वनि-प्रतिध्वनि को मनन कहना ठीक नहीं हैं। यह तो एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति हैं, जो किसी सत्यान्वेषी साधक को तब होती हैं, जब वह किसी पवित्र विचार, पवित्र भाव अथवा पावन व्यक्तित्व या उसकी दिव्य छवि को अपने में धारण करता हैं।
यदि पवित्र तत्त्वों-सत्यों को ठीक से धारण कर लिया गया हैं तो मन में स्वत: ही धारणा घटित होने लगती हैं। मन कुछ उसी तरह मौन हो उसकी अनुभूति में डूबता हैं, जैसे कि कोई स्वादलोलुप व्यक्ति स्वादिष्ट भोजन करते समय मूक और मौन हो स्वाद के अनुभव में खो जाता हैं। जैसे-जैसे धारण किए गए पवित्र विचार, पवित्र भाव अथवा पावन व्यक्तित्व या उसकी दिव्य छवि की अनुभूति प्रगाढ़ होती हैं कि मन, उसमें संजोई सारी संस्कारराशि, कर्मबीजों का ढ़ेर, आदतें, प्रवृतियॉं सभी खो जाते हैं। यहॉं तक कि मन मन-न में परिवर्तित हो जाता हैं। मन का यह परिवर्तन और रुपांतरण ही तो मनन हैं, जिसके परिणाम में अंतस् मे उज्ज्वल आत्मप्रकाश की धाराएं फूट पड़ती हैं। यह ऐसा सच हैं, जिसे जो करे, सो जाने।
अखण्ड ज्योति नवंबर 2007

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