Wednesday, September 10, 2008

श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता ऐसा सुमधुर गीत हैं, जिसे स्वयं भगवान ने गाया हैं। धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में खड़े विश्वरुप विश्वगुरु श्रीकृष्ण ने कर्म का यह काव्य कहा हैं। इसमें सृष्टि का सरगम हैं, जीवन के बोल हैं। सृष्टिसृजन, स्थिति और विलय का कोई भी ऐसा रहस्य नहीं हैं, जिसे इस भगवद्गान में गाया न गया हो। इसी तरह जीवन के सभी आयाम, सभी विद्याएँ इसमें बड़े ही अपूर्व ढंग से प्रकट हुई हैं। इस दिव्य गीत के सृष्टि सप्तक (सप्तलोक) को प्रकृति अष्टक (अष्टधा प्रकृति) के साथ स्वयं भगवती चित्शक्ति ने अपनी चैतन्य धाराओं में गूँथा हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता का परिचय स्वयं भगवद्गीता के प्रत्येक अध्याय के अंत में कहा गया हैं। “ ओम तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रम्हविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे............. नाम..............अध्याय: । " ओंकार परमेश्वर का तत्-सत् रुप में स्मरण करते हुए बताया गया हैं कि यह भगवद्गान उपनिषद् हैं, यह ब्रम्हविद्या हैं, यह योगशास्त्र हैं, जो कृष्ण और अर्जुन संवाद बनकर प्रकट हुआ हैं। भगवद्गीता के इस परिचय में गहनता और व्यापकता दोनों हैं। यह भगवद्गीता उपनिषदों की परम्परा में श्रेष्ठतम उपनिषद् हैं।

इस उपनिषद् के आचार्य श्रीकृष्ण हैं और शिष्य धनुषपाणि अर्जुन हैं। आचार्य श्रीकृष्ण समस्त ज्ञान का आदि और अन्त हैं। वे स्वयं अनन्त हैं। शिष्य अर्जुन जिज्ञासु हैं, गुरुनिष्ठ हैं और अपने सदगुरु भगवान गुरु को पूर्णत: समर्पित है। सदगुरु व सत्शिष्य की इसी स्थिति में ब्रम्हविद्या प्रकट होती हैं। सृष्टि व जीवन के सभी रहस्य कहे-सुने-समझे व आत्मसात किये जाते हैं, परन्तु इन रहस्यों का साक्षात् व साकार तभी स्पष्ट होता हैं, जब शिष्य योगसाधक बन कर सदगुरु द्वारा उपदिष्ट योग-साधना का अभ्यास करे। योग की विविध तकनीको का इसमें प्राकट्य होने से ही गीता योगशास्त्र हैं। उपनिषद्प्रणीत यह ब्रम्हविद्या-योगशास्त्र तभी समझा जा सकता हैं, जब कृष्ण-अर्जुन संवाद की स्थिति बनें। श्रीमद्भगवद्गीता तो केवल उनके अन्तस् में अपने स्वरों को झंकृत करती हैं, जो भगवान के साथ समस्वरित हैं। ‘गीता जयंती पर्व हमें इसी की स्मृति कराता हैं।

Sunday, September 7, 2008

प्रज्ञावतार की पुण्यवेला

अन्धकार जब गहराता चला जाए, तो इसकी सघनतम स्थिति के अतिसमीप ही प्रभातकाल की ब्रम्हवेला भी जुड़ी रहती हैं। गर्मी की अतिशय तपन बढ़ चलने पर वर्षा की सम्भावना का अनुमान लगाया जा सकता हैं और सार्थक भी होता हैं। चारों ओर झुलस गयी धरती हरियाली के कवच से भर जाती हैं, मानो एक अप्रत्याशित चमत्कार-सा हुआ हो। दीपक जब बुझने को होता हैं, तो उसकी लौ जोर-जोर से चमकती हैं, लपलपाने लगती हैं। मरण की वेला अतिनिकट होने पर भी रोगी में हलकी-सी चेतना अवश्य लौट आती हैं और वह असामान्य रुप से लम्बी-लम्बी सॉंसे लेने लगता हैं। सभी जानते हैं कि मृत्यु की वेला समीप आ गयी। मरण के पूर्व कुछ ही पहले चींटी के पर निकलने लगते हैं।

उपर्युक्त उदाहरण आज की युगसंधि की वेला एवं प्रज्ञावतार के आगमन के पुण्य-प्रयोजन की व्याख्या हेतु दिए गए हैं। इन दिनो असुरता जीवन-मरण का संघर्ष कर रही हैं। उसे समाप्त होना ही हैं, मात्र उसका अंतिम चरण '' हताशा की स्थिति में एक उग्र रुप और '' - इस परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाना चाहिए। अनीति की थोड़ी मात्रा नीतिवानो के सामने चुनौति बनकर पहुंचती और उन्हे अनौचित्य से लड़ पड़ने की उत्तेजना एवं पौरुष प्रदान करती है। जन-जन को दुष्टता का पराभव देखने का अवसर मिलता है। जागरुकता, आदर्शवादिता और साहसिकता का उभार होता ही तब हैं जब अनय के असुर की दुरभिसंधिया देवत्व में आक्रोश का आवेश भरती हैं। इस दृष्टि से अनय का अस्तित्व दुखदायी होते हुए भी अन्तत: उत्कृष्टता के प्रखर बने रहने की सम्भावनाएं प्रशस्त बनाए रखता है।

किन्तु यदा-कदा परिस्थितियॉं ऐसी भी आती हैं, जब संत, सुधारक और शहीद अपने प्रराक्रम प्रभाव का परिमाण भारी देखते हैं एवं विपन्नता से लड़ते-लड़ते भी सत्परिणाम की संभावना को धुमिल देखते हैं। ऐसे अवसरों पर अवतार का पराक्रम उभरता हैं और ऐसी परिस्थितियॉं विनिर्मित करता हैं, जिससे पासा पलटने, परिस्थिति उलटने का असंभाव्य भी संभव हो सके। विपित्त की विषम वेला में सदा यही होता रहा हैं। भविष्य में भी यही क्रम चलेगा। वर्तमान में इसके महातथ्य का प्रत्यक्ष स्पष्टीकरण सामने हैं। युगपरिवर्तन की इस पुण्यवेला में प्रज्ञावतार की प्रखर भूमिका संपादित होते हुए ज्ञानवानों की पैनी दृष्टि सरलतापूर्वक देख सकती है।

अखण्ड ज्योति अगस्त-1969


Saturday, September 6, 2008

मनन

मनन मन से मन-न होने की आध्यात्मिक यात्रा हैं। यह ऐसी अनोखी प्रक्रिया हैं, जिसमें संलग्न होने, समर्पित होने पर मन का संपूर्णत: विसर्जन और विलय हो जाता हैं। इस सच पर कितना ही कोई अचरज क्यों न करे, फिर भी सच तो सच ही हैं। हालॉंकि इस अनूठे रहस्य से कम ही लोग परिचित हैं जबकि मनन शब्द का प्रयोग बहुतायत में होता हैं। अनेकों, अनेक बार इसका प्रयोग करते हैं, फिर भी इसके आध्यात्मिक रहस्य का स्पर्श विरले ही कर पाते हैं।

सामान्य सोच तो एक विचार को बार-बार सोचते रहने को मनन मान लेती हैं जबकि अध्यात्मवेत्ता कहते हैं कि मन में उठती किसी विशेष विचार की गुनगुनाहट-गूँज अथवा ध्वनि-प्रतिध्वनि को मनन कहना ठीक नहीं हैं। यह तो एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति हैं, जो किसी सत्यान्वेषी साधक को तब होती हैं, जब वह किसी पवित्र विचार, पवित्र भाव अथवा पावन व्यक्तित्व या उसकी दिव्य छवि को अपने में धारण करता हैं।

यदि पवित्र तत्त्वों-सत्यों को ठीक से धारण कर लिया गया हैं तो मन में स्वत: ही धारणा घटित होने लगती हैं। मन कुछ उसी तरह मौन हो उसकी अनुभूति में डूबता हैं, जैसे कि कोई स्वादलोलुप व्यक्ति स्वादिष्ट भोजन करते समय मूक और मौन हो स्वाद के अनुभव में खो जाता हैं। जैसे-जैसे धारण किए गए पवित्र विचार, पवित्र भाव अथवा पावन व्यक्तित्व या उसकी दिव्य छवि की अनुभूति प्रगाढ़ होती हैं कि मन, उसमें संजोई सारी संस्कारराशि, कर्मबीजों का ढ़ेर, आदतें, प्रवृतियॉं सभी खो जाते हैं। यहॉं तक कि मन मन-न में परिवर्तित हो जाता हैं। मन का यह परिवर्तन और रुपांतरण ही तो मनन हैं, जिसके परिणाम में अंतस् मे उज्ज्वल आत्मप्रकाश की धाराएं फूट पड़ती हैं। यह ऐसा सच हैं, जिसे जो करे, सो जाने।

अखण्ड ज्योति नवंबर 2007


Thursday, September 4, 2008

जिसने आज दिया वही कल देगा।

जिसने आज दिया वही कल देगा। जिसने आज दिया हैं , वह कल भी देगा। वह कल भी देगा- वह कौन है ? परमात्मा ? नहीं, तुम्हारा पुण्य है। इस संसार में जो भी सुख-सुविधा मिलती है वह सब पुण्य से ही मिलती है। पुण्य ही दिलाता हैं और पुण्य ही जिलाता हैं संसार में अगर कोई मॉं-बाप हैं तो पुण्य ही हैं। वही हमारा पालनहार है। इसलिए अपने जीवन में पुण्य का संचय करते रहो। जहॉ से भी मिले पुण्य लूटते रहो। पुण्य का खजाना खाली होने पाये। इस बात का विशेष ख्याल रखना। पूरे दिन में कम से कम दो पुण्य काम जरुर करो। पाप तो दिनभर में सेकडो हो जाते हैं, पर पूरे दिन में कम से कम दो पुण्य जरुर करो। इससे हमारा ना सिर्फ यह जीवन सम्भलेगा अपितु इसके बाद का जीवन भी सम्भल जायेगा। यह जीवन का महत्त्वपूर्ण सूत्र हैं जिसे जीकर हम जीवन को सार्थकता दे सकते है।

Tuesday, September 2, 2008

आध्यात्मिक कैसे बना जा सकता है ?

पूजा अर्चा प्रतीक मात्र हैं, जो बताती है कि वास्तविक उपासक का स्वरुप क्या होना चाहिए और उसके साथ क्या उद्देश्य और क्या उपक्रम जुडा रहना चाहिए।

देवता के सम्मुख दीपक जलाने का तात्पर्य यहॉं हमें दीपक की तरह जलने और सर्वसाधारण के लिए प्रकाश प्रदान करने की अवधारणा हृदयंगम कराता है।

` पुष्प ´ चढाने का तात्पर्य यह है कि जीवनक्रम को सर्वांग सुन्दर, कोमल, सुशोभित रहने में कोई कमी रहने दी जाये।

` अक्षत ´ चढाने का तात्पर्य हैं कि हमारे कार्य का एक नियमित अंशदान परमार्थ प्रयोजन के लिए लगता रहेगा।

` चंदन लेपन ´ का तात्पर्य हैं कि सम्पर्क क्षेत्र में अपनी विशिष्टता सुगंध बनकर अधिक विकसित हो।

` नैवेद्य ´ चढाने का तात्पर्य है-अपने स्वभाव और व्यवहार में मधुरता का अधिकाधिक समावेश करना।

`जप´ का उद्देश्य हैं अपने मन:क्षेत्र में निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचने की निष्ठा का समावेष करने के लिए लिए उसकी रट लगाये रहना।

` ध्यान´ का अर्थ है अपनी मानसिकता को लक्ष्य विशेष पर अविचल भाव से केन्द्रीभूत किये रहना।

` प्राणायाम ´ का प्रयोजन अपने आपको हर दृष्टि से प्राणवान, प्रखर, प्रतिभासम्पन्न बनाये रखना।

अक्षत, चन्दन, पुष्प, धूप-दीप तो पूजा के प्रतीक मात्र हैं, असली पूजा तो लोकमंगल के लिए किए गये उदार सत्प्रयत्नों से ही ऑकी जाती है। समूचे साधना विज्ञान का तत्वदर्शन इस बात पर केन्द्रीभूत है कि जीवनचर्या का बहिरंग और अंतरंग पक्ष निरन्तर मानवी गरिमा के उपयुक्त ढॉंचे में ढलता रहे। कषाय-कल्मषों के दोष-दुर्गुण जहॉं भी छिपे हुए हो उनका निराकरण होता चले।

Monday, September 1, 2008

क्या करें क्या न करें ?

त्यागने योग्य
  • चोरी, बेईमानी, छल, मुनाफाखोरी, हराम की कमाई, मुफ्तखोरी आदि। अनीति से दूर रहना, अनीति से उपार्जित धन का उपयोग न करना।
  • मांसाहार तथा मारे हुए पशुओं के चमडे का प्रयोग बन्द करना।
  • पशुबलि अथवा दूसरों को कष्ट पहुंचाकर अपना भला करने की प्रवृति छोडना।
  • विवाहों में वर पक्ष द्वारा दहेज लेने तथा कन्या पक्ष द्वारा जेवर चढाने का आग्रह न करना।
  • विवाहों की धूम-धाम में धन की और समय की बर्बादी न करना।
  • नशे (तम्बाकू, शराब, भॉग, गॉजा, अफीम आदि) का त्याग।
  • गाली-गलौज एवं कटु भाषण का त्याग।
  • जेवर और फैशनपरस्ती का त्याग।
  • अन्न की बर्बादी, जूठन छोडने की आदत का त्याग।
  • जाति-पॉति के आधार पर ऊंच-नीच, छूत-छात न मानना।
  • पर्दाप्रथा का त्याग-किसी को पर्दा करने के लिए बाध्य न करना। स्वयं पर्दा न करना।
  • महिलाओं एवं लड़कियों के साथ पुरुषों और लड़को की तुलना में भेद-भाव या पक्षपात न करना।
अपनाने योग्य सत्प्रवृतियॉ
  • कम से कम दस मिनट नित्य नियमित गायत्री उपासना।
  • घर में अपने से बडो का नियमित अभिवादन करना।
  • छोटों के सम्मान का ध्यान रखना, उनसे तू करके न बोलना।
  • अपने कर्तव्यों के प्रति जागरुक रहना तथा उनका पालन करना।
  • परिश्रम का अभ्यास बनाये रहना, किसी काम को छोटा न समझना।
  • नियमित स्वाध्याय-जीवन को सही दिशा देने वाला सत्साहित्य कम से कम आधा घण्टे नित्य स्वयं पढना या सुनना।
  • भारतीय संस्कृति की प्रतीक शिखा एवं यज्ञोपवीत का महत्त्व समझना, उन्हें निष्ठापूर्वक धारण करना-दूसरों को प्रेरणा देना।
  • सादगी का जीवन जीना, औसत भारतीय स्तर के रहन-सहन के अनुरुप विचार एवं अभ्यास बनाना। उसमें गौरव अनुभव करना।
  • ज्ञान-यज्ञ-सद्विचार प्रसार के लिये कम से कम 50 पैसा धन और एक घण्टा समय प्रतिदिन बचाकर सही ढंग से खर्च करना।
  • परिवार में सामुहिक उपासना, आरती, आदि का क्रम चलाना।
  • प्रतिवर्ष अपना जन्मदिन सामूहिकरुप से यज्ञीय वातावरण में मनाना तथा जीवन की सार्थकता के लिए व्रतशील जीवनक्रम बनाना।
  • समाज के प्रति, अपने उत्तरदायित्वों के प्रति जागरुकता, समाज में सत्प्रवृतियॉं बढाने के लिए किये जाने वाले सामूहिक प्रयासों में उत्साह भरा योगदान देना।

Sunday, August 31, 2008

शिक्षा के साथ विद्या भी

मनुष्य को सुयोग्य बनाने के लिए उसके मस्तिष्क को दो प्रकार से उन्नत किया जाता है। (1) शिक्षा द्वारा (2) विद्या द्वारा। शिक्षा के अन्तर्गत वे सब बातें आती हैं जो स्कूलों में कालेजों में, ट्रेनिंग कैम्पों में, हाट बाजार मे घर में, दुकान में, समाज में सिखाई जाती है। गणित , भूगोल, इतिहास, भाषा, शिल्प, व्यायाम, रसायन, चिकित्सा, निर्माण व्यापार, कृषि, संगीत, कला आदि बातें सीखकर मनुष्य व्यवहार कुषल, चतुर , कमाउ, लोकप्रिय एवं शक्ति सम्पन्न बनता है। विद्या द्वारा मनोभूमि का निर्माण होता है।
मनुष्य की इच्छा आकांक्षा, भावना, श्रद्धा, मान्यता, रुचि एवं आदतों के अच्छे ढॉंचे में ढालना विद्या का काम है। चौरासी लाख योनियों में घूमते हुए आने के कारण पिछले पाशविक संस्कारों से मन भरा रहता है उनका संशोधन करना विद्या का काम है।
शिक्षा का अर्थ है- सांसारिक ज्ञान। विद्या का अर्थ है-मनोभूमि की सुव्यवस्था। शिक्षा आवश्यक है, पर विद्या उससे भी अधिक आवश्यक है। शिक्षा बढ़नी चाहिए , पर विद्या का विस्तार उससे भी अधिक होना चाहिए अन्यथा दूषित मनोभूमि रहते हुए यदि सांसारिक सामर्थ्य बढ़ी तो उसका परिणाम भयंकर होगा।

Friday, August 29, 2008

संयम-नियम

मात्र आहार पर ही शारीरिक स्वास्थ्य निर्भर नहीं रहता। जलवायु, मन:स्थिति और संयम-नियम पर भी बहुत हद तक अवलम्बित है। हिमालय का शीतप्रधान वातावरण, निरन्तर गंगा जल का उपयोग, हर काम में समय की नियमित व्यवस्था, भूख से कम खाने से पाचन सही होना, चित्त का दिव्य चिन्तन में निरत रहना, मानसिक विक्षोभ और उद्वेग का अवसर न आना यह ऐसे आधार हैं, जिनका मूल्य पौष्टिक आहार से हजार गुना ज्यादा है। तपस्वी लोग सुविधा-साधना का, आहार का अभाव रहने पर भी दीर्घजीवी, पुष्ट और सशक्त रहते हैं, उसका कारण उपर्युक्त हैं जिसका महत्त्व आमतौर से नहीं समझा जाता है।

-परमपूज्य गुरुदेव आचार्य श्रीराम शर्मा

Thursday, August 28, 2008

कर्मकांड

लोग उपासना का एक अंश ही सीखे हैं-कर्मकांड । जप, हवन, पूजन, स्तवन आदि शरीर एवं पदार्थों से सम्पन्न हो सकने वाली विधि- व्यवस्था तो कर लेते है, पर उस साधना को प्राणवान सजीव बनाने वाली भावना के समन्वय की बात सोचते तक नहीं। सोचे तो तब, जब भावना नाम की कोई चीज उनके पास हो। बडी मछली छोटी मछली को निगल जाती हैं और कामना-भावना को, कामनाओं की नदी में आमतोर से लोगो की भाव कोमलता जल-भुनकर खाक होती रहती हैं तथ्य यह हैं कि भावना पर श्रद्धा विश्वास पर आन्तरिक उत्कृष्टता पर ही अध्यात्म की , साधना की और सिद्धियों की आधारशिला रखी हुयी है। यह मूल तत्व ही न रहे तो साधनात्मक कर्मकांड, मात्र धार्मिक क्रिया-कलाप बन कर रह जाते हैं। उनका थोडा सा मनोवेज्ञानिक प्रभाव ही उत्पन्न होता हैं। साधना के चमत्कार श्रद्धा पर अवलम्बित है।

-आचार्य श्रीरामशर्मा

Saturday, August 23, 2008

आओ ! हम भी युगज्योति का स्पर्श पाएँ

सब तरफ हाहाकार-चीत्कार-चारों ओर अंधकार-ही-अंधकार। साधन बहुत, 'शक्ति बहुत, किन्तु अन्धकार में उनका उपयोग कैसे हो ? जिन्हें कुछ चाहिये, कुछ-का-कुछ उठा ले रहे हैं। जिनके पास कुछ देने को हैं, उन्हे पता नहीं किसे देना हैं। हर कार्य और उसके लिये हर वस्तु, पर इससे क्या-सभी बेठिकाने-अनर्थ तो होगा ही-कारण अन्धकार। इस अन्धकार को दूर करो, इसे निकाल बाहर करो-चारों ओर यही चीख-पुकार। यही हमें सब ओर से घेरे हैं।

एक नन्हा सा दीपक मुसकराया-कहाँ हैं अंधकार ? हर तरफ से आवाजें उठीं-यहाँ-यहाँ। दीपक पहुँचा-पूछा, कहां ? उत्तर मिला-हर तरफ। दीपक ने कहा-पर अभी तो कहा जा रहा था ‘यहाँ’ ! पर यहाँ तो कहीं नहीं हैं। लोगों ने चारों ओर देखा, सारी स्थिति साफ-साफ दीख रही थी। अपनी बात सही न साबित होते देख सभी दीपक पर बिगड़ उठे-तुम हमें झूंठा साबित करने आये हो। हमारी चोटें देखो, हमारी हालत देखो, यह क्या बिना अन्धकार के सम्भव हैं ? दीपक शांत भाव से बोला-तुम्हें झूंठा सिद्ध करने का नहीं, अपना सत्य समझाने का विचार हैं, पर जो समझे उसी को तो समझाऊँ। तुमने अपनी चोटें देख लीं-उनमें मलहम लगाओ, मैं अन्य स्थान देखूँ।

दीपक हर आवाज पर गया, पर कहीं अन्धकार नहीं मिला। सब जगह वही क्रम दोहराया गया। लोगों ने देखा, अरे सचमुच अन्धकार तो दीपक के पहुँचते ही भाग जाता हैं। जहाँ दीपक होता हैं, वहाँ साफ-साफ दिखाई पड़ने लगता हैं। दीपक के चारों ओर भीड़ लग गयी। सब प्रसन्नचित्त अपना-अपना काम करने लगे।

एक ने पूछा-अन्धकार किसने भगाया ? उत्तर मिला-इस ज्योति ने। एक बोला-तो ज्योति हमें दे दो, अपने घर ले जायेंगे। दूसरा बोला-नहीं मुझे दो और मुझे-मुझे का शोर मच गया। दीपक ने कहा-ज्योति सभी के साथ जा सकती हैं, पर उसकी अपनी शर्त हैं, कीमत हैं। लोग हर्ष से पुकार उठे-हम कीमत देंगे, शर्त पूरी करेंगे, ज्योति लेंगे।

तो सुनो, ज्योति वर्तिका पर ठहरती हैं, पर उसे स्नेहसिक्त होना चाहिये और हाँ उसे धारण करने के लिये ऐसा पात्र जो सीधा रह सके और स्नेह को स्वयं ही न पी जाये। यह सब कर सको, तो फिर करो ज्योति पाने की तैयारी। कुछ ने सार्थक प्रयास किया, दीपक ने उन्हें स्पर्श किया, वे प्रकाशित हुऐ और चल पड़े। शेष शिकायत करते रहे।

आज भी हर व्यक्ति के लिये कुछ ऐसा ही अवसर हैं। युगज्योति हममें से हर एक का आह्वान कर रही हैं। पर हम हैं कि लाभ उठाने की कोशिश कम, शिकायतें अधिक कर रहे हैं। अच्छा हो, इसके लिये जीवन में साधन जुटायेँ युगज्योति के संपर्क में आने की साधना करें। फिर तो युगज्याति का स्पर्श पाते ही, जीवन में अन्धकार खोजने पर भी नहीं मिलेगा।

अखण्ड ज्योति नवम्बर १९९९

Friday, August 22, 2008

ज्ञान की प्राप्ति

ज्ञान की चाहत बहुतों को होती हैं, पर ज्ञान की प्राप्ति विरले करते हैं। दरअसल ज्ञान और ज्ञान में भारी भेद हैं। एक ज्ञान हैं-केवल जानकारी इकट्ठी करना, यह बोद्धिक समझ तक सीमित हैं और दूसरी ज्ञान हैं-अनुभूति, जीवंत प्रतीति। एक मृत तथ्यों का संग्रह हैं; जबकि दूसरा जीवंत सत्य का बोध हैं। इन दोनो में बडा अन्तर हैं-पाताल और आकाश जितना। सच तो यह हैं कि बोद्धिक ज्ञान कोई ज्ञान नहीं हैं, यह तो बस, ज्ञान का झूठा अहसास भर हैं । भला अन्धे व्यक्ति को प्रकाश का ज्ञान कैसे हो सकता हैं ? बोद्धिक ज्ञान कुछ ऐसा ही हैं।

सच्चा ज्ञान कहीं बाहर से नहीं आता, यह भीतर से जागता हैं। इसे सीखना नहीं उघाडना होता हैं। सीखा हुआ ज्ञान जानकारी हैं; जबकि उघाडा हुआ ज्ञान अनुभूति हैं। जिस ज्ञान को सीखा जाये, उसके अनुसार जीवन को जबरदस्ती ढालना पड़ता है, फ़िर भी वह कभी संपूर्णतया उसके अनुकूल नही बन पाता। उस ज्ञान और जीवन में हमेशा एक अंतर्द्वंद बना ही रहता हैं, पर जो ज्ञान उघाड़ा जाता हैं उसके आगमन से ही आचरण सहज उसके अनुकूल हो जाता हैं। सच्चे ज्ञान के विपरीत जीवन का होना एक असंभावना हैं, ऐसा कभी हो ही नहीं सकता।

श्री रामकृष्ण परमहंस अपने शिष्यों को एक कथा सुनाते थे। एक घने बीहड़ वन में दो मुनि जा रहे थे। सांसारिक संबंधो की दृष्टि से वे पिता-पुत्र थे। पुत्र आगे चल रहा था, पिता पीछे था। तभी वन में सिंह का गर्ज़न सुने दिया। ब्रम्हज्ञान की बातें करने वाले पिता को घबराहट हुई , उसने पुत्र को सचेत किया- “ चलो ! कहीं पेड़ पर चढ़ जायें, आगे खतरा हैं।’ पुत्र पिता की इन बातों पर हंसा । हँसते हुए बोला- ‘आप तो हमेशा यही कहते रहे हैं कि शरीर नश्वर हैं और आत्मा अमर, साक्षी और द्रष्टा हैं। फिर भला खतरा किसे हैं ! जो नश्वर हैं, वह तो मरेगा ही और जो अमर हैं, उसे कोई मार नहीं सकता,’’ पर पिता के मुख में भय की छाया गहरा चुकी थी। अब तक वह पेड़ पर जा चढ़ा था। इधर पुत्र पर सिंह का हमला भी हो गया, पर वह हँसता रहा। अपनी मृत्यु में भी वह दृष्टा था। उसे न दु:ख था और न पीड़ा य क्योंकि उसे ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी थी ; जबकि उसके पिता के पास ब्रम्हज्ञान ज्ञान का झूठा एहसास भर था। इसीलिए कहा जाता हैं कि ज्ञान की प्राप्ति विरल हैं।

अखंड ज्योति नवम्बर २००५


Thursday, August 21, 2008

मृत्यु एक मंगलमय महोत्सव

मृत्यु एक मंगलमय महोत्सव :- सुखपूर्वक एवं शोकरहित मृत्यु वरण करने के लिए एक महामन्त्र है, येनानृत्तनि नोक्तानि प्रीति भेद: कृतो न च। आस्तिक: श्रद्धानश्च स सुखंमृत्युमृच्छति। अर्थात जिसने कभी असत्य आचरण नहीं किया हो, जिसके अन्दर ईर्ष्या-द्वेष का भाव न हो, जो आत्मा में परम विश्वासी हो तथा जो अच्छाइयों पर अनन्य श्रद्धा-आस्था रखता हो, वही सुखपूर्वक-शांतिपूर्वक महामृत्यु को वरण कर सकता हैं। अत: हम भी सद्चिन्तन, सदाचरण और सद्व्यवहार को जीवन में उतारकर मृत्यु को मांगलिक महोत्सव के रुप में मना सकते है।

Wednesday, August 20, 2008

कर्मकांड

कपडे को रंगने से पूर्व धोना पडता हैं। बीज बोने से पूर्व जमीन जोतनी पडती हैं। भगवान का अनुग्रह अर्जित करने के लिये भी शुद्ध जीवन की आवश्यकता हैं। साधक ही सच्चे अर्थों में उपासक हो सकता हैं। जिससे जीवन साधना नहीं बन पडी उसका चिन्तन, चरित्र, आहार, विहार, मस्तिष्क अवांछनीयताओं से भरा रहेगा। फलत: मन लगेगा ही नहीं। लिप्साएं और तृष्णायें जिसके मन को हर घडी उद्विग्न किये रहती हैं, उससे न एकाग्रता सधेगी और न चित्त की तन्मयता आयेगी। कर्मकांड की चिन्ह पूजा भर से कुछ बात बनती नही। भजन का भावनाओं से सीधा सम्बन्ध हैं। जहाँ भावनाएं होंगी, वहां मनुष्य अपने गुण, कर्म , स्वभाव में सात्विकता का समावेश अवश्य करेगा।

Tuesday, August 19, 2008

एक साधना

एक साधना जिसे करने के लिए हम आपको अनुरोधपूर्वक प्रेरित करते हैं-वह हैं दिन-रात में से कोई भी पन्द्रह मिनट का समय निकाले और एकान्त में शांतिपूर्वक सोचे कि वे क्या हैं ? वे सोचे कि क्या वे उस कर्तव्य को पूरा कर रहे हैं, जो मनुष्य होने के नाते उन्हे सौपा गया था। मन से कहिए कि वह निर्भीक सत्यवक्ता की तरह आपके अवगुण साफ-साफ बतावें।

-परमपूज्य गुरुदेव आचार्य श्रीराम शर्मा

Monday, August 18, 2008

जीवन जीने की कला

यदि जीवन में गंतव्य का बोध न हो तो भला गति सही कैसे हो सकती है। और यदि कहीं पहुंचना ही न हो तो संतुष्टि कैसे पायी जा सकती है। जो जीवन जीने की कला से वंचित है समझना चाहिए कि उनके जीवन में न तो दिशा है और न कोई एकता है। उनके समस्त अनुभव निरे आणविक रह जाते है। उनसे कभी भी उर्जा का जन्म नहीं हो पाता, जो कि ज्ञान बनकर प्रकट होती। ऐसा व्यक्ति सुख-दु:ख तो जानता है, पर उसे कभी भी आनन्द की अनुभूति नहीं होती। जीवन में यदि आनन्द पाना है तो जीवन को फूलों की माला बनाना होगा। जीवन के समस्त अनुभवों को एक लक्ष्य के धागे में कलात्मक रीति से गूंथना होगा। जो जीने की इस कला को नहीं जानते है, वे सदा के लिए जिंदगी की सार्थकता एवं कृतार्थता से वंचित रह जाते है।

Sunday, August 17, 2008

साधना से सिद्धि

साधना की गई , पर सिद्धि नहीं मिली। तप तो किया गया पर तृप्ति नहीं मिली। अनेक साधकों की विकलता यही है। लगातार सालों-साल साधना करने के बाद वे सोचने लगते है, क्या साधना का विज्ञान मिथ्या है ? क्या इसकी तकनीको में कोई त्रुटि है ? ऐसे अनेको प्रश्न -कंटक उनके अन्त:करण में हर पल चुभते रहते है। निरन्तर की चुभन से उनकी अंतरात्मा में घाव हो जाता है। जिससे वेदना रिसती रहती है। बड़ी ही असह्य होती है चुभन और रिसन की यह पीड़ा। बड़ा ही दारुण होता है यह दरद !!
महायोगी गोरखनाथ का एक युवा शिष्य भी एक दिन ऐसी ही पीड़ा से ग्रसित था। वेदना की विकलता की स्पष्ट छाप उसके चेहरे पर थी। एक छोटे-से नाले को पार करके वह एक खेत की मेड़ पर हताश बैठा था। तभी उसे पास के खेत से ही गोरखनाथ आते दिखाई दिये।
उनके चरणों में सिर रखकर प्रणाम करते हुए उसने पूंछा ,‘‘ गुरुदेव, मेरी वर्षों की साधना निष्फल क्यों हुई ? भगवान मुझसे इतना रुठे क्यों है ?’’ महायोगी हँसे और कहने लगे,‘‘ पुत्र, कल मैं एक बगीचे में गया था। वहा कुछ दूसरे युवक भी थे। उनमें से एक को प्यास लगी थी। उसने बाल्टी कुई में डाली, कुँआ गहरा था। बाल्टी खींचने में भारी श्रम करना पड़ा,लेकिन जब बाल्टी लौटी तो खाली थी। उस युवक के सभी साथी हंसने लगे।
मैनें देखा, बस वह कहने भर को बाल्टी थी, उसमें छेद-ही-छेद थे। बाल्टी कुईं में गई ,पानी भी भरा, पर सब बह गया। वत्स, साधक के मन की यही दशा है। इस छेद वाले मन से कितनी ही साधना करो,पर छेदों के कारण सिद्धि नहीं मिलती। इससे कितना ही तप करो,पर तृप्ति नहीं मिलती। भगवान कभी भी किसी से रुठे नहीं रहते। बस साधक के मन की बाल्टी ठीक होनी चाहिए। कुँआ तो सदा ही पानी देने के लिए तैयार है। उसकी ओर से कभी भी इन्कार नहीं है।’’

Saturday, August 16, 2008

आनंद का मूल स्त्रोत-प्रेम

प्रेम-भाव की प्राप्ति पुस्तको से होती है और उपदेशो से। उसकी प्राप्ति धन अथवा संपत्ति से भी नही होती और मान और पद प्रतिष्ठा ही उसको संभव बना सकती है। भक्ति और सत्ता द्वारा भी प्रेम-भाव की सिद्धि नही हो सकती। जबकि लोग प्रायः इन्ही साधनों द्वारा ही प्रेम-भाव को पाने का प्रयत्न किया करते है। पुस्तके पढ़कर लेखक के प्रति, शक्ति और वैभव देखकर सत्ताधारी के प्रति जो आकर्षण अनुभव होता है, उसका कारण प्रेम नही होता है। उसका कारण होता है-प्रभाव, लोभ और भय। वास्तविक, प्रेम-भाव वहीँ संभव है, जहाँ कोई प्रभाव होगा, स्वार्थ अथवा आशंका।

ऐसा वास्तविक और निर्विकार प्रेम-भाव केवल सेवा द्वारा ही पाया जा सकता है। सेवा और प्रेम वस्तुतः दो भिन्न-भिन्न वस्तुएँ नही है। यह एक भाव के ही दो पक्ष है। जहाँ प्रेम होगा, वहाँ सेवा भाव होगा और जहाँ सेवा-भाव होगा वहाँ प्रेम-भाव का होना अनिर्वाय है। जिसके प्रति मनुष्य के ह्रदय मे प्रेम-भाव नही होगा, उसके प्रति सेवा-भाव का भी जागरण नही हो सकता और जो सेवा-भाव सेव्य के प्रति प्रेम-भाव नही जमाता, वह सेवा नही, स्वार्थपरक चाकरी का ही एक रूप होगा। जिसकी सेवा करने में सुख, शान्ति और गौरव का अनुभव हो, समझ लेना चाहिए की उस सेव्य के प्रति ह्रदय मे प्रेम-भाव अवश्य है।

अखंड ज्योति, जून १९६८,

श्रद्धा का महत्त्व

कोई उपदेश तभी प्रभावशाली हो सकता है जब उसका देने वाला, सुनने वालों का श्रद्धास्पद हो। वह श्रद्धा जितनी ही तीव्र होगी उतना ही अधिक उपदेश का प्रभाव पड़ेगा। प्रथम कक्षा के मन्त्र दीक्षित को यह प्रतिज्ञा करनी पड़ती है कि वह गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा रखेगा। उसे वह देवतुल्य या परमात्मा का प्रतीक मानेगा।
अश्रद्धालु के मन पर ब्रह्मा का उपदेश भी कुछ प्रभाव नहीं डाल सकता। श्रद्धा के अभाव में किसी महापुरुष के दिन-रात साथ रहने पर भी कोई व्यक्ति कुछ लाभ नहीं उठा सकता है और श्रद्धा होने पर दूरस्थ व्यक्ति भी लाभ उठा सकता है। इसलिए आरम्भिक कक्षा के मन्त्र दीक्षित को गुरु के प्रति तीव्र श्रद्धा भी धारण करनी पड़ती है।
विचारों को मूर्तिमान रुप देने के लिए उनको प्रकट रुप से व्यवहार में लाना पड़ता है। जितने भी धार्मिक कर्म काण्ड, दान पुण्य, व्रत उपवास, हवन पूजन, कथा कीर्तन आदि है वे सब इसी प्रयोजन के लिए है कि आन्तरिक श्रद्धा व्यवहार में प्रकट होकर साधक के मन में परिपुष्ट हो जाय। दीक्षा के समय स्थापित हुई श्रद्धा कर्म काण्ड के द्वारा सजग रहे इसी प्रयोजन के लिए समय-समय पर गुरु पूजन किया जाता है। क्रिया और विचार दोनो के समिश्रण से एक संस्कार बनता है।
निर्धन व्यक्ति भले ही न्यूनतम मूल्य की वस्तुऐं ही क्यों न भेंट करे, उन्हें सदैव गुरु को बार-बार अपनी श्रद्धान्जलि अर्पित करना चाहिए।

Friday, August 15, 2008

धर्म क्या हैं ?

धर्म क्या हैं ? :- धर्म प्रवचन नहीं है। बोद्धिक तर्क -विलास वाणी का वाक्जाल भी धर्म नहीं है। धर्म तप हैं। धर्म तितिक्षा है। धर्म कष्ट-सहिष्णुता है। धर्म परदु:खकातरता है। धर्म सचाइयों और अच्छाइयों के लिए जीने और इनके लिए मर मिटने का साहस हैं, धर्म मर्यादाओं की रक्षा के लिए उठने वाली हुकारे हैं धर्म सेवा की सजल संवेदना है। धर्म पीडा-निवारण के लिए स्फुरित होने वाला महासंकल्प है। धर्म पतन-निवारण के लिए किए जाने वाले युद्ध का महाघोष हैं। धर्म दुष्प्रवर्तियों , दुष्कृत्यों, कुरीतियों के महाविनाश के लिए किए जाने वाले अभियान का शंखनाद है। धर्म सर्वहित के लिए स्वहित का त्याग हैं। ऐसा धर्म केवल तप के वासंती अंगारो में जन्म लेता हैं। बलिदान के वासंती राग में इसकी सुमधुर गूंज सुनी जाती है।

Thursday, August 14, 2008

विचार

ध्यान रहे, धनुष के तीरों की भाँति मन से विचार निकलते हैं। वे लक्ष्य भेद करने के बाद फिर से उसी व्यक्ति के पास वापस लौट आते हैं, जिसने उन विचारों को उत्पन्न किया हैं। इसलिए यदि हम शुभ, सकारात्मक एवं रचनात्मक विचार प्रषित कर रहे हैं तो ये वैचारिक जगत में चलते हुए उन लोगो तक पहुँचते हैं, जिनकी ओर लक्षित किये गये थे। रचनात्मक विचारों के तीर पुन: हमारे पास लोगों के आशीर्वाद, सद्भावना और शुभकामना लेकर लौट आते हैं और हमारा मन अधिक-से-अधिक प्रेरित, प्रसन्न और उत्साहित हो जाता है। इसके विपरीत जब विध्वंसात्मक विचार अपने लक्ष्य की ओर जाते हैं तो फल भिन्न होता हैं। यदि लक्ष्य अधिक सशक्त हैं तो हमारे ऋणात्मक विचार उसका भेदन नहीं कर पाते और वे विचारो के बाण लक्ष्य से टकराकर दोगने वेग से हमारे अपने उपर ही वार करते हैं। यदि इन्होने अपने लक्ष्य पर आघात कर भी दिया तो भी इनकी प्रतिक्रिया में विध्वंसक विचारो का दोगना वेग हम पर प्रहार करता है।

Wednesday, August 13, 2008

राखी का धागा

पुरूष का पुरुषार्थ और नारी की मर्यादा, दोनों ही राखी के धागे से बंधे हैंयह राखी का धागा कमजोर हुआ अथवा टूटा तो केवल पुरूष का पुरुषार्थ भटकेगा, बल्कि नारी की मर्यादाएँ भी आहत होंगी, क्षत-विक्षत होंगीइस धागे की मजबूती और दृढ़ता पर ही सामाजिक सरसता-समरसता और सौन्दर्य की इन्द्रधनुषी छटा चहुँ और छाई रहती हैइसमें यदि किसी भी तरह की टूटन या दरकन आई तो इस बहुरंगी रसमय छटा को रसहीन गाढे धुंधलके मैं खोते देर लगेगी

पुरूष और नारी के बीच स्वाभाविक नाता सृष्टि के आदि से हैंजब से ग्रहपिंड अस्तित्व मैं आए, जब से धरती की हरी-भरी गोद विनिर्मित हुई, तभी से पुरूष और नारी भी है और तभी से उनमें परस्पर आकर्षण, आसक्ति और पवित्र प्रेम से पूर्ण सम्बन्ध भी हैंहालाँकि इस सम्बन्ध में बहुविधि विविधताएँ मानवीय भावनाओं के बहुआयामों के अनुरूप सदा से रहीं हैंपुरूष पति, प्रेमी, पुत्र, भ्राता बनकर अपने पुरुषार्थ के लिए सचेष्ट रहा हैं और नारी पत्नी, प्रेमिका, पुत्री भगिनी बनकर अपनी मर्यादाओं के संरक्षण के लिए प्रयासरत रही हैं

पुरूष और नारी के बीच इन अनगिनत नातों मैं भ्राता और भगिनी अथवा भाई बहिन के नाते का अपना विशिष्ट सौन्दर्य हैंइस नाते में आकर्षण अनन्त हैं, पर वासना का विष नहीं हैंइसमें आसक्ति और मोह की जगह भावपूर्ण बलिदान हैइसके पवित्र प्रेम में भावों के सभी रंग और रूप होते हुऐ भी किसी भी तरह के कलुष की कालिमा नहीं हैंभावमय भावनाओं से भरा, पवित्र प्रेम से पूरित सम्बन्धों का यह संसार राखी के धागों से उपजता हैं और इसी के रंगों के अनुरूप अपने अनगिनत रूपों की सृष्टि करता हैंइस धागे में बंधकर और इसे बांधकर पुरूष और नारी, दोनों ही अपने पुरुषार्थ और अपनी मर्यादाओं के खोते जा रहे स्वधर्म को पुनः प्राप्त कर सकते हैं

अखंड ज्योति अगस्त २००८

Tuesday, August 12, 2008

उद्देश्य ऊँचा रखें

मिट्टी के खिलौने जितनी आसानी से मिल जाते हैं, उतनी आसानी से सोना नहीं मिलता। पापों की ओर आसानी से मन चला जाता है, किंतु पुण्य कर्मों की ओर प्रवृत्त करने में काफी परिश्रम करना पड़ता है। पानी की धारा नीचे पथ पर कितनी तेजी से अग्रसर होती है, किन्तु अगर ऊँचे स्थान पर चढ़ाना हो, तो पंप आदि लगाने का प्रयत्न किया जाता है।
बुरे विचार, तामसी संकल्प, ऐसे पदार्थ हैं, जो बड़ा मनोरंजन करते हुए मन में धॅस जाते हैं और साथ ही अपनी मारकशक्ति को भी ले आते हैं। स्वार्थमयी नीच भावनाओं का वैज्ञाननिक विश्लेषण करके जाना गया है कि वे काले रंग की छुरियों के समान तीक्ष्ण एवं तेजाब की तरह दाहक होती हैं। उन्हें जहाँ थोड़ा-सा भी स्थान मिला कि अपने सदृश और भी बहुत-सी सामग्री खींच लेती हैं। विचारों में भी पृथ्वी आदि तत्त्वों की भाँति खिंचने और खींचने की शक्ति होती है। तदनुसार अपनी भावना को पुष्ट करने वाले उसी जाति के विचार उड़-उड़ कर वहीं एकत्रित होने लगते हैं।
यही बात भले विचारों के संबंध में है। वे भी अपने सजातियों को अपने साथ इकट्ठे करके बहुकुटुंबी बनने में पीछे नहीं रहते। जिन्होंने बहुत समय तक बुरे विचारों को मन में स्थान दिया है, उन्हें चिंता, भय और निराशा का शिकार होना ही पड़ेगा।

-अखण्ड ज्योति

Monday, August 11, 2008

पहले दो, पीछे पाओ

यह प्रश्न विचारणीय है कि महापुरुष अपने पास आने वालों से सदैव याचना ही क्यों करता है? मनन के बाद मेरी निश्चित धारणा हो गई कि त्याग से बढ़कर प्रत्यक्ष और तुरंत फलदायी और कोई धर्म नहीं है। त्याग की कसौटी आदमी के खोटे-खरे रूप को दुनिया के सामने उपस्थित करती है। मन में जमे हुए कुसंस्कारों और विकारों के बोझ को हलका करने के लिए त्याग से बढ़कर अन्य साधन हो नहीं सकता।

आप दुनिया से कुछ प्राप्त करना चाहते हैं, विद्या, बुद्धि संपादित करना चाहते हैं, तो त्याग कीजिए। गाँठ में से कुछ खोलिए। ये चीजें बड़ी महंगी हैं। कोई नियामक लूट के माल की तरह मुफ्त नहीं मिलती। दीजिए, आपके पास पैसा, रोटी, विद्या, श्रद्धा, सदाचार, भक्ति, प्रेम, समय, शरीर जो कुछ हो, मुक्त हस्त होकर दुनिया को दीजिए, बदले में आप को बहुत मिलेगा। गौतम बुद्ध ने राजसिंहासन का त्याग किया, गाँधी ने अपनी बैरिस्टरी छोड़ी, उन्होंने जो छोड़ा था, उससे अधिक पाया।

विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर अपनी एक कविता में कहते हैं, ``उसने हाथ पसार कर मुझ से कुछ माँगा। मैंने अपनी झोली में से अन्न का एक छोटा दाना उसे दे दिया। शाम को मैंने देखा कि झोली में उतना ही छोटा एक सोने का दाना मौजूद था। मैं फूट-फूट कर रोया कि क्यों न मैंने अपना सर्वस्व दे डाला, जिससे मैं भिखारी से राजा बन जाता।’’

-अखण्ड ज्योति मार्च

Sunday, August 10, 2008

उठो! हिम्मत करो

स्मरण रखिए, रुकावट और कठिनाइयाँ आपकी हितचिंतक हैं। वे आपकी शक्तियों का ठीक-ठीक उपयोग सिखाने के लिए हैं। वे मार्ग के कंटक हटाने के लिए हैं। वे आपके जीवन को आनंदमय बनाने के लिए हैं। जिनके रास्ते में रूकावटें नहीं पड़ीं, वे जीवन का आनंद ही नहीं जानते। उनको जिंदगी का स्वाद ही नहीं आया। जीवन का रस उन्होंने ही चखा है, जिनके रास्ते में बड़ी-बड़ी कठिनाइयाँ आई हैं। वे ही महान् आत्मा कहलाए हैं, उन्हीं का जीवन, जीवन कहला सकता है।
उठो! उदासीनता त्यागो, प्रभु की ओर देखो। वे जीवन के पुंज हैं। उन्होंने आपको इस संसार में निरर्थक नहीं भेजा। उन्होंने जो श्रम आपके ऊपर किया है, उसको सार्थक करना आपका काम है। यह संसार तभी तक दु:खमय दीखता है, जब तक कि हम इसमें अपना जीवन होम नहीं करते। बलिदान हुए बीज पर ही वृक्ष का उद्भव होता है। फूल और फल उसके जीवन की सार्थकता सिद्ध करते हैं। सदा प्रसन्न रहो। मुसीबतों का खिले चेहरे से सामना करो। आत्मा सबसे बलवान है, इस सच्चाई पर दृढ़ विश्वास रखो। यह विश्वास ईश्वरीय विश्वास है। इस विश्वास द्वारा आप सब कठिनाइयों पर विजय पा सकते हैं। कोई कायरता आपके सामने ठहर नही सकती। इसी से आपके बल की वृद्धि होगी। यह आपकी आतंरिक शक्तियों का विकास करेगा।
-अखण्ड ज्योति

Saturday, August 9, 2008

स्वाध्याय एक अनिवार्य दैनिक कृत्य

मानव जीवन में सुख की वृद्धि करने के उपायों में स्वाध्याय एक प्रमुख उपाय है। स्वाध्याय से ज्ञान की वृद्धि होती है। मन में महानता, आचरण में पवित्रता और आत्मा में प्रकाश आता है। स्वाध्याय एक प्रकार की साधना है, जो अपने साधक को सिद्धि के द्वार तक पहुँचाती है। जीवन को सफल, उत्कृष्ट एवं पवित्र बनाने के लिए स्वाध्याय की बड़ी आवश्यकता है। प्रतिदिन नियम पूर्वक सद्ग्रंथों का अध्ययन करते रहने से बुद्धि तीव्र होती है, विवेक बढ़ता है और अंत:करण की शुद्धि होती है, अत: प्रतिदिन चिंतन-मनन के साथ स्वयं पढ़ें एवं दूसरों को पढ़ाने का प्रयास करें।

-पं.श्रीराम शर्मा आचार्य।

Friday, August 8, 2008

जीवन-मृत्यु

जो जीवन के रहस्य को जान लेते हैं, वे मृत्यु के रहस्य को भी जान लेते हैं इस जीवन का प्रत्येक क्षण बोध का एक अवसर हैं जिन्दगी का हर पल किसी नए रहस्य को अनावृत करने के लिए, उसे जानने के लिए हैं जो इस सच से अनजान रहकर जिन्दगी के क्षण-पल को, दिवस-रात्रि को यों ही चुका देते है, वे दरअसल जीवन से चुक जाते हैं मृत्यु भी उनके लिए केवल रहस्यमय भयावह अँधेरा बन कर रह जाती हैं

चीनी संत लाओत्से के जीवन का एक प्रसंग है साँझ के समय उसके पास एक युवक ची-लू एक उलझन लेकर आया लाओत्से ने साँझ के झुटपुटे में उसके चेहरे की और ताकते हुऐ कहा-" अपनी बात कहो ! " इस पर उस युवक ने पूंछा- " मृत्यु क्या हैं ? " लाओत्से ने अपने उत्तर मैं थोडी हैरानी व्यक्त करते हुऐ कहा-" अरे ! समस्या तो जीवन की होती है, मृत्यु की कैसी समस्या ! " फ़िर थोडी देर रूककर लाओत्से ने धीमे से कहा-"मृत्यु उनके लिए समस्या बनी रहती है, जो जीवन की समस्या का समाधान नहीं जान लेते "

ची-लू लाओत्से के कथन को ध्यान से सुन रहा था वृद्ध लाओत्से उससे कह रहा था-" अपनी शक्तियों को केवल जीवन जी लेने में नहीं, बल्कि उसे ज्ञात करने मैं लगाओ मृत्यु एवम् मृतात्माओं की चिंता करने के बजाय जीवन एवम् जीवित मनुष्यों की समस्याओं के समाधान की खोज करो अरे ! जब तुम अभी जीवन से ही परिचित नहीं हो, तब तुम मृत्यु से भला कैसे परिचित हो सकते हो ! "

लाओत्से के कथन की गहराई का अहसास ची-लू को होने लगा उसने अनुभव किया की जो जीवन को जान लेते हैं, केवल वे ही मृत्यु को जान पाते हैं जीवन का रहस्य जिन्हें ज्ञात हो जाता है, उन्हें मृत्यु भी रहस्य नहीं रह जाती ; क्योंकि वह तो उसी सच का दूसरा पहलु है मृत्यु का भय केवल उन्हें सताता है, जो जीवन को नहीं जानते मृत्यु के भय से जो मुक्त हो सका, समझना की उसने जीवन का बोध पा लिया

अखंड ज्योति- जून २००८

Monday, August 4, 2008

स्थायी मिलन का रहस्य

प्यार के अंकुरित होते ही पिय मिलन की एक हूक उठती है। छटपटाता दिल अपने प्रिय से मिलने के लिए तड़पता है। भावाकुल हृदय मिलते भी है पर हर मिलन उनमे एक अतृप्ति पैदा करता है। प्यास को बुझाने के बजाये उसे और गहरा करता है। प्रत्येक मिलन के बाद उनकी छटपटाहट, बैचेनी और बढती जाती है। ऐसा इसलिए क्योंकि वे स्थायी मिलन के रहस्य से अनजान हैं।

प्यार इबादत है, आराधना है, उपासना है। इसके रहस्य को जान लिया जाय तो वह स्वयं परमेश्वर है। जो प्रेमी को पवित्रता, सजलता, शान्ति, एकात्मता और अनन्तता का वरदान देने से नहीं चूकताप्रेम के रहस्य जानने वाला प्रेमी ' रसो वै सः ' के तत्व को समझ कर स्वयं रसमय-परमेश्वरमय हो जाता है।

प्यार के अनेकों किस्से दुनिया मैं प्रचलित है। शीरी-फरहाद, लैला-मजनूँ, हीर-राँझा, रोमियो-जूलियट की अमर कथाएँ बड़े चाव से कही-सुनी जाती है पर प्रेम की रहस्यमय महिमा को जानने वालों को मालूम है की यह तो प्रेम-साधना का सिर्फ़ पहला चरण है, जिसे इन अमर विभूतियों ने अनुभव किया। परस्पर हित के लिए उत्सर्ग, स्वार्थ नहीं बलिदान इनका मूल मन्त्र था, जिसे अपनाकर वे मानवीय प्रेम के चरम बिन्दु तक पहुँच सके।

प्रेमदीवानी मीरा का प्यार प्रेमसाधना का सर्वोच्च प्रकार था। उनके प्रियतम प्रभु श्रीकृष्ण का उनके समय कोई स्थूल अस्तित्व था। चर्मचक्षुओं से उन्हें देख पाने पर भी उनकी भाव-साधना निरंतर गहराती गई। द्दैवी प्रेम से की गई शुरुआत ईश्वरीय प्रेम के सर्वोच्च प्रेम तक जा पहुँची। उन्होंने अपनी भावनाओं मैं यो मन पश्यति सर्वत्र, सर्वं मयी पश्यति सत्य का अनुभव किया। चिरवियोग-चिर्मिलन मैं बदल गया।

वह एक सत्य दे गयी-प्यार मैं देह की क्या डरकर। प्यार तो भावनाओं मैं ही अंकुरित, प्रस्फुटित एवम विकसित होता हैं। यदि प्रिय को भावनाओं मैं पाने का यातना किया जाया तो भावों की ऊष्मा अंतःकरण मैं हूक, छातापताहत, ह्रदय के फट पड़ने की-सी
अनुभूति देती है। बाह्य मिलन हाथ करके यदि इसे धेर्यपूर्वक सह लिया जाया तो इस टाप मैं साडी वासनाएं, जन्मा-जन्मान्तर के संचित कुसंस्कार भस्म हो जाते है। पवित्र हुई मानवीय भावनाएं दैवी भावनाएं का रूप ले लेती है और ईश्वरीय प्रेम के सर्वोच्च प्रेम के बिन्दु तक जा पहुंचती हैं।

अपने प्रिय आराध्य परमपूज्य गुरुदेव मीरा के कृष्ण की ही भांति स्थूल में नहीं है, परन्तु भावुक भक्तों के भावजगत मैं हर पल उपस्तिथ हैंप्रेमी साधक अपनी प्रेमसाधना में भावमय गुरुमूर्ति एवं भावमय परमेश्वर की अनन्ता मैं जब स्वयं को विलीन होते हुए अनुभव करता है, तब कबीर के स्वरों में गा उठता है, मन मगन भया फ़िर क्यों बोले

अखंड ज्योति १९९७

Friday, August 1, 2008

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः

राष्ट्र जागरण की बात बहुत लोगों द्वारा, बहुत अवसरों पर, बहत बार दुहराई जाती हैं ; हालाँकि राष्ट्र की सारी गतिविधियाँ चल रही हैंचुनावों का सिलसिला चलता है, नई योजनायें बनती हैं, आकर्षक नारे दिए जाते हैं, समस्याओं का समाधान करने के लुभावने वादे किए जाते हैं-फिर भी राष्ट्र जाग्रत नहीं हैदरअसल सक्रियता-जाग्रति का पर्याय नहींसक्रिय मनुष्य में मनुष्यता का अभाव बेतरह खटकता हैइसी तरह राष्ट्र की विविध गतिविधियों के बीच राष्ट्रीय भावना का अभाव बराबर अनुभव हो रहा है और उसके निवारण के उपाय सफलीभूत होने से हर राष्ट्रप्रेमी का अंतःकरण चीत्कार कर रहा हैराष्ट्रीय-चरित्र, राष्ट्रीय-गौरव, राष्ट्रीय-मर्यादा, राष्ट्रीय-आत्मीयता, राष्ट्रीय-समृद्धि आदि की वृद्धि और उत्कर्ष की बात क्या की जाए-उसका कोई न्यूनतम स्वरूप भी निर्धारित हो सकना चिंतनीय बात हैऐसा लगता है की राष्ट्र सचमुच सोया पड़ा है, सामान्य निद्रा में नहीं-मूर्च्छा जैसी गहन स्थिति मेंउसे चैतन्य, जाग्रत, सतेज बनाने के लिए विशेष प्रयास किया जाना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी हैपर प्रयास करे कौन ? राष्ट्रीय-चेतना को कौन उभारे ? उसे कैसे विकसित करें ? घूम-फिरकर हमारी आदत कुछ दलों और उनकी सरकार की और देखने की पड़ गई हैपर यह बड़ी भारी भ्रान्ति हैजब सरकार विदेशी थी तो उसने सोये राष्ट्र का उपयोग अपने स्वार्थ में करने के लिए उसे उसी स्थिति में रखना पसंद किया और आज जब वह आंतरिक है तो वह भी उसी सुप्त समाज का एक अंग हैसोया हुआ अंग सोये हुऐ को कैसे जगा सकता है ? जिनकी दृष्टि स्वयं में सिमित हैं, उनसे विस्तृत दृष्टिकोण की कामना कैसे करें ?

राष्ट्रजागरण का महान कार्य तो जाग्रत अंतःकरण वाले व्यक्तियों का हैप्रचलित मान्यताओं के परे जिनका मस्तिष्क सोच सकता है, ऐसे व्यक्ति ही राष्ट्रीय चेतना जाग्रत कर सकते हैजिनके जीवन की गतिविधियाँ किन्ही अंशों में स्वार्थ की सीमा के बाहर सक्रिय हैं, व्यक्तिगत स्वार्थों की अपेक्षा सामुहिक हितचिंतन जिनके स्वभाव में है तथा जिनके अनुरूप जीवनप्रक्रिया चलाने के जो थोड़े-बहुत अभ्यस्त है, वे ही इस कार्य में आगे सकते है। तात्कालिक लाभ की मृग-मरीचिका में भटकते नागरिकों को जो दूरगामी परिणामों का स्मरण दिला कर अपेक्षाकृत अधिक स्थायी लाभप्राप्ति के लिए पुरुषार्थ की प्रेरणा दे सकें, ऐसे विकसित दृष्टिकोण तथा समर्थ व्यक्तियों का यह कार्य है

ऐसे व्यक्तियों को प्राचीनकाल में ' पुरोहित ' कहते थेपुरोहित शब्द से भी यही भाव निकलता है कि जो सामने का लाभ नहीं-आगे का-दूरगामी हित समझकर उसकी प्राप्ति की व्यवस्था बना सकेंहीन स्वार्थों के स्थान पर महत स्वार्थों की सीढियों पर चलते हुऐ ' परमार्थ ' तक लोगों को गति दे सकें-वही पुरोहित हैंपुरोहित में ' चिन्तक और साधक ' दोनों गुण आवश्यक हैजो चिंतन-विश्लेषण द्वारा सही परामर्श दे सकें तथा आदर्श जीवन-पद्धति से मूर्तिमान प्रेरणा रूप बनकर रहे वही पुरोहित हैंअपने जीवन में आदर्श का अभ्यास करने के साथ-साथ समाज हित की जो कल्पना कर सके, ऐसे व्यक्ति इस वर्ग में सकते हैं | राष्ट्रजागरण कार्य प्रमुख रूप से ऐसे ही प्रकाशवान व्यक्तियों का हैये संघटित होकर स्वयं को इस महान प्रयोजन के लिए समर्पित कर सकें तो यह महान राष्ट्र विश्वमंच पर पुनः सिंहनाद कर सकता है

जीवन दर्शन

आँखें बंद हो तो पाँव अपने आप ही राह भटक जाते हैंआँखें बंद किए चलने वाले किसी गड्ढे में जा गिरे तो कोई अचरज नहीभूलना-भटकना, गुमराह हो जाना, पग-पग पर ठोकरों से चोटिल होते रहना ही ऐसों की नियति हैंउनसे यही कहना हैं की आँखें बंद रखने के अतिरिक्त कोई पाप हैं और कोई अपराधजिसने आँखें खोल ली, उसके जीवन में फिर अँधेरा नहीं रहता

भिक्षु आनंदभद्र के जीवन का एक मार्मिक प्रसंग हैंवह पूरबी देशों में धर्मप्रचार के लिए गए हुए थेकुछ अज्ञानियों ने उन्हें पकड़ लिया और भारी यातना दीपरन्तु इन यातनायों के बीच भी उनकी शान्ति अविचल थीयातनाओं के बीच भी वह परम प्रसन्न थेगालियों के उत्तर में उनकी वाणी मिठास से सनी थीकिसी ने उनसे पूछा, आप में इतनी अलौकिक शक्ति कैसे आई ? उन्होंने एक हलकी मुस्कराहट के साथ कहा, बस, मैंने अपनी आंखों का उपयोग करना सीख लिया

प्रश्नकर्ता ने अचरज से प्रतिप्रश्न किया, लेकिन आंखों का शान्ति और साधुता से क्या सम्बन्ध ? संभवतः वह भिक्षु आनंदभद्र की सहनशीलता के मर्म से अपरिचित थाउसे समझाने के लिए महाभिक्षु ने कहा, मैं जब ऊपर आकाश की ओर देखता हूँ तो पाता हूँ की इस धरती का जीवन बहुत ही क्षणभंगुर ओर सपने की तरह हैं ओर सपने में किया हुआ किसी का व्यवहार मुझे कैसे छू सकता हैं ? जब दृष्टि अपने भीतर निहारती हैं तो उसे पाता हूँ जो अविनश्वर हैं-उसका तो कोई कुछ भी बिगाड़ने में समर्थ नहीं है

जब मैं अपने आस-पास देखता हूँ तो पाता हूँ-ऐसे भी भावनाशील जन हैं, जिनके हृदयो में मेरे लिए असीम करुना हैयह अनुभूति कृतज्ञता से भर देती हैअपने पीछे देखने पर अहसास होता है कि कितने ही प्राणी ऐसे हैं, जो मुझसे भी कहीं ज्यादा पीड़ा भोग रहे हैंउन्हें देखकर मेरा हृदय करुणा ओर प्रेम से भर जाता हैइस भांति मैं शांत हूँ, आनंदित हूँ ओर प्रेम से भर गया हूँ, क्योंकि मैंने अपनी आंखों का उपयोग करना सीख लिया हैसचमुच ही आँखें खोलने से-जीवन-दर्शन मिलता है

अखंड ज्योति अप्रैल २००४

Thursday, July 31, 2008

जीवन क्या हैं ?

जीवन क्या हैं ? यह एक ऐसा प्रश्न हैं, जो युगों-युगों से पूछा जा रहा हैं एवम् अनुत्तरित हैंश्रुति की शरण मे जायें, तो वह कहती हैं कि हर व्यक्ति द्वारा जीवन के स्वरूप को समझा जाना चाहिए और उससे जुड़े तथ्यों को स्वीकार करना चाहिए, चाहे वे कितने भी कडुए एवम् अप्रिय क्यों प्रतीत होते हों ? जीवन एक चुनौती हैं, एक समर हैं, एक जोखिम हैं एवम् उसे इस रूप में स्वीकार करने के अलावा हमारे पास और कोई चारा भी नही

जीवन एक रहस्य हैं, तिलिस्म हैं, भूल-भुलैया हैं, एक प्रकार से एक गोरखधन्धा हैंजिस किसी के पास भी गंभीर प्रयवेक्षण करने की दृष्टि हो, वह उसकी तह तक पहुँच सकता हैंइसी आधार पर जीवन से जुड़ी भ्रांतियों के कुहासों को भी मिटाया जा सकता हैंकई प्रकार के खतरों से भी बचा जा सकता हैंकर्तव्य के रूप में जीवन अत्यन्त भारी किंतु अभिनेता की तरह हंसने-हंसाने वाला हल्का-फुल्का रंगमंच भी हैं, जिसका विनोदपूर्वक मंचन कर आनंद लिया जा सकता हैं

जीवन एक गीत हैं, जिसे पंचम स्वर मे गाया जा सकता हैंजीवन एक अवसर हैं, जिसे गँवा देने पर सुब कुछ हाथ से निकल जाता हैंजीवन एक स्वप्न हैं, जिसमे स्वयं को खोया जा सके तो भरपूर आनंद का रसास्वादन किया जा सकता हैंजीवन एक प्रतिज्ञा हैं, यात्रा हैं, जीने की एक कला हैंउसे सफल कैसे बनाया जाए, यह यदि जान लिया जाए, इस पर मनन कर लिया जाए, तो फिर उससे बड़ा भाग्यशाली कोई नहीजीवन सौंदर्य हैं, प्रेम हैं, सत्-चित-आनंद हैंवह सब कुछ हैं, जो नियंता की इस स्रष्टि में सर्वोत्तम कहा जाने योग्य हैंहम इसे जीकर तो दिखाएँ

अखंड ज्योति अगस्त २०००

Wednesday, July 30, 2008

जीवन की सफलता

जीवन ऊर्जा का महासागर हैकाल के किनारे पर अगणित अंतहीन ऊर्जा की लहरे टकराती रहती हैइनकी कोई शुरुआत है, और कोई अंत; बस मध्य हैमनुष्य भी इन अनगिनत तरंगो मे एक छोटी-सी तरंग हैएक लघु बीज है-असीम संभावनाओ का

तरंग की स्वाभाविक आकांक्षा है, सागर होने की, और बीज की स्वाभाविक चाहत है कि वृक्ष हो जाएतरंग जब तक महासागर की व्यापकता मे फैले नही, बीज जब तक फूलों से खिले नही, फलों से लदे नही, तब तक तृप्ति असंभव हैइनके अस्तित्व की, इनके जीवन की सफलता भी इसी मे है

मनुष्य की स्वाभाविक आकांक्षा है परमात्मा होने कीपरमात्मा का अर्थ है-जीवन की सफलता और पूर्णतापरमात्मा स्वर्ग या आसमान मे बैठा हुआ कोई व्यक्ति नही हैयह तो जीवन की अन्तिम सफलता है, परम पूर्णता हैजीवन की तृप्ति एवम परितोष यही हैइसके पहले पड़ाव तो बहुत है, पर मंजिल नही है

इस मंजिल तक पहुंचे बिना, प्रत्येक मनुष्य पीड़ित रहता हैअसफलता का दंश उसे सालता रहा हैवह चाहे जितना धन कमा ले, कितना ही वैभव जुटा ले, किंतु उसे अपने जीवन की सफलता एवम सार्थकता की अनुभूति नही हो पातीएक कंटीली चुभन, बैचेनी भरा दरद हमेशा बना रहता हैइसे भुलाने की कितनी ही कोशिश की जाती है, लेकिन हर कुंठा मे ही तब्दील होती रहती है

और यह ठीक भी है, क्योंकि यदि कहीं ऐसा हो जाए तो बीज कभी भी वृक्षबनेगातरंग को कभी सागर की व्यापकता मिलेगीबीज जब तक वृक्ष बन कर फूलों से खिले, उसकी सुगंध मुक्त आकाश में बिखरे, तब तक परित्रप्ति कैसी ? तरंग जब तक महासागर की व्यापकता पाए तब तक सफलता कैसी ? मनुष्य भी जब तक जीवन के परम शिखर परमात्मा को छूकर उससे एकाकार हो, तब तक उसकी सार्थकता कैसी ?

जीवन की सफलता तो परमात्मा की अनंतता को पाने में हैंइसे बिना पाए जिन्होंने समझ लिया कि वे सफल हो गए, बड़े अभागे हैंबडभागी तो वे हैं, जो अनुभव करते है कि जीवन मे कुछ भी करो, असफलता हाथ लग सकती हैंअतः प्रयास करते रहना चाहिएऐसे व्यक्ति एक--एक दिन परमात्मा को पा लेंगे, स्वयं परमात्मा हो जायेँगे

Tuesday, July 29, 2008

क्या हम मनुष्य है ?

क्या हम मनुष्य है ? अटपटे से लगने वाले इस सवाल का जवाब बड़ा सीधा है। संवेदना मे जितनी हमारी गहराई होगी, मनुष्यता मे उतनी ही ऊंचाई होगी और संग्रह मे जितनी ऊंचाई होगी, मनुष्यता मे उतनी ही नीचाई होगी। संवेदना और संग्रह जिन्दगी की दो दिशाए है। संवेदना सम्पूर्ण हो तो संग्रह शून्य हो जाता है और जिनके चित्त संग्रह की लालसा से घिरे रहते है, संवेदना वहाँ अपना घर नही बसाती।

अरब देश की एक मलिका ने अपनी मौत के बाद कब्र के पत्थर पर निम्न पंक्तिया लिखने का हुक्म जारी किया-" इस कब्र मे अपार धनराशि गडी हुई है, जो व्यक्ति अत्यधिक निर्धन, दीन-दरिद्र और अशक्त हो, वह इसे खोद कर प्राप्त कर सकता है। " कब्र बनाये जाने के बाद से हजारो दरिद्र और भिखमंगे उधर से गुजरे, लेकिन उनमे से कोई भी इतना दरिद्र नही था कि धन के लिए किसी मरे हुई व्यक्ति की कब्र खोदे।

आखिरकार वह इन्सान भी पहुँचा, जो उस कब्र को खोदे बिना नही रह सका। अचरज की बात तो यह थी कि कब्र खोदने वाला यह व्यक्ति स्वयं एक सम्राट था। उसने कब्र वाले इस देश को अभी-अभी जीता था। अपनी जीत के साथ ही उसने बिना समय गँवाए उस कब्र की खुदाई का काम शुरू कर दिया, लेकिन कब्र की गहराई मे उसे अपार धनराशि के बजे एक पत्थर मिला, जिस पर लिखा हुआ था- कब्र खोदने वाले इन्सान, तू अपने से सवाल कर-" क्या तू सचमुच मनुष्य है ? "

निराश अपमानित वह सम्राट, जब कब्र से वापस लौट रहा था तो लोगो ने कब्र के पास रहने वाले बुढे भिखमंगे को जोर से हंसते देखा। वह कह रहा था-" मैं सालो से इंतजार कर रहा था, अंततः आज धरती के सबसे अधिक निर्धन, दरिद्र एवम् अशक्त व्यक्ति का दर्शन हो ही गया ! " सचमुच संवेदना जिस ह्रदय मे नही है, वही दरिद्र, दीन और अशक्त है। जो संवेदना के अलावा किसी और संपत्ति के संग्रह के फेर मे रहता है, एक दिन उसकी सम्पदा ही उससे पूँछती है-क्या तू मनुष्य है ? और आज हम पूंछे अपने आप से-क्या हम मनुष्य है ?

अखंड ज्योति दिसम्बर २००५

Sunday, July 27, 2008

भारतमाता

भारतमाता का आँचल हिमालय के श्वेत हिम शिखरों से लेकर केरल की हरियाली तक फैला हुआ है। कन्याकुमारी के महासागर की तरंगो मे इसकी तिरंगी आभा लहराती है। माता अपने आँचल मे अपनी सभी सौ करोड़ संतानों को समेटे हुऐ है | सभी जातिया, सभी वर्ण, सभी वंश इसी की कोख से उपजे है। माता अपनी छाती चीरकर सभी के लिए पोषण की व्यवस्था जुटाती है। संतानों का सुख ही इस माँ का सुख है, संतानों का दुःख ही इसकी पीड़ा है।

इस प्रेममयी जननी ने अपने पुत्रो के लिए, पुत्रियों के लिए बहुत कुछ सहा है। परायो के आघात ने इसे कष्ट तो दिया, पर इसके धेर्य को डिगा नही पाए।

यह क्षमामयी माता बिलखी तो तब, तड़पी तो तब, जब अपनों ने ही मीरजाफर , जयचंद बन कर इस पर वार किए। माँ की ममता को छला, इसकी भावनाओ को आहत किया, कोख को लजाया। आज भी जब इसके अपने बच्चे परायो के बहकावे मे आकर अपने को आतंकित करते है, क्रूरता के कुकृत्य करते है तो इस धैयॅमयी का धीरज रो पड़ता है। समझ मे नही आता की यह किससे कहे, कैसे कहे अपनी पीड़ा ! कहाँ बांटे अपना दरद !

हालाँकि भारतमाता के सत्पुत्रो-सत्पुत्रियो की भी कमी नही है। वीर शिवाजी, महाप्रतापी राणा प्रताप, झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई, इसके यश को दिगंतव्यापी बनाने वाले विवेकानंद, इस पर अपने सुखो को निछावर करने वाले सुभाष-गाँधी, इसके दुखों को मिटाने के लिए सदा-सवर्दा तप मे रत युग ऋषि आचार्य श्रीराम शर्मा आदि मात्तृ भक्तो ने ही तो इसे गुलामी से मुक्त करा कर गोरवान्वित किया। आज माता ने फ़िर से अपनी संतानों की संवेदना को पुकारा है, जो इसकी कोख का मन रखे, इसके आँचल की अखंडता बनाये रखे।

अखंड ज्योति - अगस्त २००६

|| स्वंत्रता दिवस २००८ की हार्दिक मंगलकामनाऐ ||